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Yamkeshwar Mahadev Mandir Ki Kahani - Yamkeshwar Mahadev Mandir

   Yamkeshwar Mahadev Mandir Ki Kahani

Yamkeshwar Mahadev Mandir


Yamkeshwar Mahadev Mandir वह स्थल है जहां साक्षात भगवान शंकर ने यमराज को परास्त करके  मार्कंडेय ऋषि के प्राणों की रक्षा की थी |

Describe This Article -  Neelkhant Mahadev Temple

Yamkeshwar का नाम Yamkeshwar क्यों पड़ा ?

भगवान शंकर और यमराज के मध्य भयानक युद्ध हुआ| तत पश्चात यमराज परास्त हो गए और भगवान शंकर के चरणों में गिरकर क्षमा याचना  करने लगे | 

अंत में यमराज की स्तुति  से प्रसन्न होकर  भगवान शंकर यमराज से बोले कि जहां मृत्युंजय जप होता हो उस स्थान पर तुम्हें नहीं जाना चाहिए जिस  स्थान पर तुम खड़े हो उस स्थान पर  मेरी स्वयंभू लिंग रूपी मूर्ति उत्पन्न हुई है उसका तुम पूजन अर्चन करो|

 यह मूर्ति तुम्हारे नाम से ही प्रसिद्ध होगी इस शिवलिंग का जो भी पूजन करेगा उसके पास बड़ी से बड़ी मृत्यु एवं अकाल मृत्यु भी उसके करीब नहीं आएगी  इसी कारण {यम} यमराज और{ ईश्वर}भगवान शंकर के नाम से यमकेश्वर नाम पड़ा|                     

Yamkeshwar Mahadev mandir

Yamkeshwar Mahadev का कालक्रम वर्णन

सतयुग में ब्रह्मा जी के पुत्र  कुत्स ऋषि तथा कर्दम ऋषि के मृगशृड् नामक पुत्र हुए|

मृगशृड् के तेजस्वी पुत्र मार्कंडेय के 16 वर्ष प्रारंभ होने पर मुनि  मृगशृड्  का हृदय शोक से व्याकुल हो उठा संपूर्ण इंद्रियों में व्याकुलता छा गई वह दिनता पूर्वक विलाप करने लगे पिता को अत्यंत दुखी और करुणा विलाप करते देख मार्कंडेय ने उनके शोक  का कारण पूछा|  

मृगशृड् ने  शोक का कारण बताया और कहा कि पुत्र भगवान शिव ने तुम्हें केवल 16 वर्ष की आयु दी है|उसकी समाप्ति का समय आ पहुंचा है अतःमुझे शोक हो रहा है| 

उस दिन मार्कंडेय जी  पूजा में तल्लीन होकर जैसे ही स्तुति करने को उद्यत हुए उसी समय मृत्यु को साथ लिए महिष (भैंस ) पर आरूढ़ होकर यमराज काल बनकर उन्हें लेने आ पहुंचा| 

राहु द्वारा चंद्रमा ग्रसने(प्राण लेने के लिए) की भांति गर्जना करते हुए काल ने मार्कंडेय को हर्ट पूर्वक ग्रसना(प्राण खींचना) आरंभ किया| 

मार्कंडेय शिवलिंग से लिपट गए उसी समय परमेश्वर शिव उस शिवलिंग से सहसा प्रकट हो गए और हुंकार भर कर प्रचंड गर्जना करते हुए तुरंत ही यमराज के वक्षस्थल(छाती) पर लात मारी मृत्यु देव उनके चरण प्रहार से भयभीत होकर दूर जा पड़े यम से झगड़ा होने के कारण ही इस स्थान का नाम यमरार पड़ा {यमरार का वर्तमान में नाम जिमराड़ी  है

वर्तमान में जो यमकेश्वर नाम का स्थान है वहां पर आकर भगवान शंकर प्रसन्न हो गए और यमराज से बोले कि जहां मेरा मृत्युंजय जप होता हो उस स्थान पर तुम्हें नहीं जाना चाहिए 

अंत में यमराज की स्तुति से प्रसन्न होकर शिव ने कहा कि जिस स्थान पर तुम खड़े हो उस स्थान पर मेरी स्वयंभू लिंग रूपी मूर्ति उत्पन्न हुई है उसका तुम पूजन अर्चन करो यह मूर्ति तुम्हारे नाम से ही प्रसिद्ध होगी 

इस शिवलिंग का जो पूजन करेगा वह अकाल मृत्यु  को प्राप्त नहीं करेगा पुराणों में वर्णित मारकंडे की तपस्थली एवं यमराज द्वारा पूजन अर्चन  किया हुआ शिव का मंदिर वर्तमान में Yamkeshwar  में स्थित है|

How To Reach Yamkeshwar Mahadev Mandir Uttarakhand? 


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